गुरु-शिष्य परम्परा योजना नियम

उद्देश्य

  1. हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी चित्रकला एवं चम्बा रुमाल, पारंपरिक चित्रकला, मूर्तिकला, हस्त-षिल्प और काष्ठ कला, निष्पादन कलाओं की विभिन्न दुर्लभ विधाओं यथा हारुल, ढोलरु व अन्य विषिष्ट लोक गायन व लोक वादन आदि कलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु सिद्धहस्त कलाकारों, षिल्पियों द्वारा नए कलाकारों और शोधार्थियों को इन कलाओं का प्रषिक्षण प्रदान करना।
  2. ब्राह्मी, शारदा, टांकरी, पावुची, पंडवानी, चन्दवाणी, भट्टाक्षरी आदि प्राचीन लिपियों का प्रषिक्षण
    सिद्धहस्त जानकारों/गुरुओं द्वारा शोधार्थियों को प्रदान करना।
  3. गुरु-षिष्य परंपरा के अन्तर्गत निर्मित कलाकृतियों एवं आलेखों आदि की प्रदर्षनियां आयोजित करना।

संचालन

  1. अकादमी द्वारा प्रतिवर्ष बजट प्रावधान के अनुसार पारंपरिक लोककलाओं तथा प्राचीन लिपियों के प्रषिक्षणार्थ कार्यकारी परिषद की स्वीकृति से प्रदेष के उन स्थानों में केन्द्र खोले जाएंगे, जहां गुरु नियुक्त करने योग्य सिद्धहस्त वरिष्ठ कलाकार, षिल्पी, काष्ठ कलाकार आदि और प्राचीन लिपियों के विद्वान उपलब्ध होंगे।
  2. स्थान की व्यवस्था गुरु को स्वयं करनी होगी। अकादमी संग्रहालयों, मंदिरों, शैक्षणिक संस्थानों आदि में स्थान की व्यवस्था करने में सहयोग दे सकती है, लेकिन उस पर कोई व्यय नहीं किया जाएगा।
  3. एक गुरु के पास कम-से-कम 3 और अधिकतम 5 षिष्य अवष्य होने चाहिएं।
  4. इस प्रषिक्षण की अवधि एक वर्ष होगी।

मानदेय

  1. उक्त लोक कलाओं तथा प्राचीन लिपियों के प्रषिक्षण के लिए गुरु को रु. 3000/- मासिक मानदेय तथा प्रषिक्षु को रु. 1000/- मासिक प्रोत्साहन राषि देय होगी।
  2. इस योजना के तहत गुरु अपने षिष्यों को प्रतिमास कम से कम 20 दिनों में (प्रति दिन कम- से-कम दो घण्टे) सम्बंधित कला विधा, षिल्प एवं लिपि का प्रषिक्षण/ज्ञान प्रदान करेगा।
  3. प्रषिक्षण सामग्री के लिए अतिरिक्त राषि देय नहीं होगी।

विविध नियम

  1. गुरु का चयन कार्यकारी परिषद द्वारा किया जाएगा।
  2. षिष्यों का चयन गुरु की सहमति से सचिव अकादमी द्वारा किया जाएगा।
  3. गुरु प्रत्येक षिष्य की प्रगति रिपोर्ट मासिक रूप से सचिव अकादमी को भेजेंगे।
  4. प्रषिक्षण केन्द्र का कार्य सुचारू रूप से न चलने की स्थिति में सचिव अकादमी द्वारा उस केन्द्र को बंद किया जा सकेगा।

नियम संषोधन

नियमों में संषोधन का अधिकार कार्यकारी परिषद का होगा।